राजस्थान का सामान्य परिचय
इस पोस्ट में राजस्थान का भूगोल के टॉपिक राजस्थान का सामान्य परिचय से संबंधित Latest व पूर्णतः updated महत्वपूर्ण Notes दिए गए हैं। इनमें आद्य महाकल्प, पुराजीवी महाकल्प, मध्यजीवी महाकल्प, नवजीवी महाकल्प, राजस्थान का निर्माण आदि से सम्बंधित महत्वपूर्ण एवं परीक्षा उपयोगी जानकारियों को सरल और आसान भाषा में व्याख्या सहित शामिल किया गया है।
ये Notes RPSC, RSMSSB, RSSB, RAS, Patwar, Police, LDC, VDO, Fireman, Woman Superwiser, REET तथा राजस्थान राज्य की अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हैं।
- Subject: राजस्थान का भूगोल
- Topic: राजस्थान का सामान्य परिचय
- Last Updated:
- Content Type: Notes
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मरूप्रदेश, राजपूताना एवं राजस्थली जैसे नामों से प्रसिद्ध राजस्थान एक ऐसा प्रदेश है, जहाँ भूगोल एवं इतिहास एकाकार हो गया है।
यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों ने न केवल यहाँ के इतिहास को एक दिशा दी है अपितु यहाँ के सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक परिवेश को निर्धारित एवं नियंत्रित करने में भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में राजस्थान की विशिष्ट पहचान बनायी है।
राजस्थान का भू-आकृतिक स्वरूप अत्यधिक विशिष्ट एवं विविधताओं से युक्त है। यहाँ आर्कियन एवं प्री-केम्ब्रियन युग की संरचनाएँ साथ-साथ दृष्टिगत होती है। राजस्थान की भू-गर्भिक संरचना को आद्य महाकल्प, पुराजीवी महाकल्प, मध्यजीवी महाकल्प एवं नवजीवी महाकल्प में बाँटा जा सकता है-
1. आद्य महाकल्प
आद्य महाकल्प को राजस्थान के संदर्भ में 2 भागों में बाँटा गया है -
| (i) अरावली पूर्व | (ii) केम्ब्रियन पूर्व (प्री- केम्ब्रियन) |
1. अरावली पूर्व
कैम्ब्रियन से पहले आद्य महाकल्प के शैल पूर्वोत्तर में दिल्ली के उत्तर व दक्षिण-पश्चिम में खम्भात की खाड़ी तक अरावली पर्वतमाला के रूप में विस्तृत है। इन पर्वतों का उत्थान प्री-कैम्ब्रियन काल में ही हुआ था किन्तु देहली समूह के निक्षेपण के बाद इनका पुनः नवीकरण हुआ । राजस्थान के चित्तौड़गढ़ व भीलवाड़ा के मध्य दुश्यांश बेराच घाटी में 110 किलोमीटर क्षेत्र बुन्देलखण्ड नीस के शैल मिलते हैं। इसे 'भीलवाड़ा सुपर ग्रुप' भी कहा जाता है।
उत्तरी मेवाड़ व अरावली में बायोटाइट ग्रेनाइट द्वारा अन्तर्वेधित गार्नेट युक्त ग्रेनुलाइट तथा सिस्ट पाए जाते है।
2. प्री-केम्ब्रियन
अरावली महासमूह व देहली महासमूह का निर्माण इसी काल में हुआ।
अरावली महासमूह
अरावली महासमूह मुख्यतः- फायलाइट्स शैल एवं क्वार्टजाइट व डोलोमाइटस शैलों से बना है। फायलाइट शैल आधारीय शैल समूहों पर स्थित है तथा कुछ स्थानों पर कार्बनयुक्त है।
अरावली महासमूह का ऊपरी भाग फायलाइट व क्वार्टजाइट शैलों से बना है।
अरावली महासमूह को 2 अन्य समूहों-झाड़ोल समूह व उदयपुर समूह में बाँटा गया है।
देहली महासमूह
देहली महासमूह के शैल राजस्थान के बड़े भू-भाग में विद्यमान हैं।
देहली महासमूह शैल का विस्तार देहली से दक्षिण-पश्चिमी गुजरात तक है।
अजमेर व पश्चिम मेवाड में इस महासमूह के शैल अरावली पर्वत श्रृंखला की पहाडियों में सुंदर पर्वतों का निर्माण करते हैं।
देहली महासमूह में रायलो (अरावली के पूर्व में) व अलवर अजबगढ़ शैल समूह सम्मिलित हैं।
रायलो समूह में चूना पत्थर, संगमरमर, क्वार्टजाइट्स शैल है।
अलवर समूह अलवर के आस-पास पर्वत श्रृंखला का निर्माण करते है।
अजबगढ समूह में मुख्यतः बायोटाइट सिस्ट है, जिनमें पेगमेटाइट एवं एपेलाइट आग्नेय शैल शामिल है।
2. पुराजीवी महाकल्प
इस महाकल्प में विंध्यन महासमूह एवं पर्मियन कार्बोनिफेरस सम्मिलित हैं।
1. विंध्यन महासमूह
देहली एवं कुड़प्पा शैलों के निक्षेपण के पश्चात प्रायद्वीपीय क्षेत्र में भू-हलचल व अपरदन की क्रिया चलती रही जिससे एक अन्तराल के
बाद नए शैलों का निक्षेपण शुरू हुआ जो 60000 वर्ग किमी. में विस्तृत है।
राजस्थान में यह महासमूह उत्तर-पूर्व करौली एवं धौलपुर से लेकर दक्षिण-पश्चिम निम्बाहेडा तक फैला हुआ है।
राजस्थान में इस समूह के शैल पूर्वी राजस्थान के विंध्य बेसिन में पाये जाते हैं।
पश्चिमी राजस्थान में विंध्य महासमूह के 2 उप बेसिन नागौर बेसिन व बिरमानिया (जैसलमेर) बेसिन पाये जाते हैं।
2. पर्मियन कार्बोनिफेरस
बाप बोल्डर बैड
फलौदी जिले के बाप गाँव के आसपास हिमानी के निक्षेपण पाये जाते हैं । ये कार्बोनिफेरस युग के अवशेष है।
यह गोलाकार व अर्द्धगोलाकार रूप में मालानी आग्नेय शैल, विंध्य महासमूह व अरावली महासमूह के विभिन्न शैलों से निर्मित है।
भादुरा बालूकाश्म
ये बाप व भादुरा के आस-पास कुछ स्थानों पर विकसित हुए हैं।
इनका निर्माण सामुद्रिक अवस्था में हुआ है। ये भादुरा के उत्तर पश्चिम से हरबंस तक फैले हुए हैं।
इनमें भूरे बालूकाश्म, पीले रंग के लौहयुक्त बालूकाश्म, मृतिकाएँ एवं शैल पाए जाते हैं।
3. मध्यजीवी महाकल्प
मध्यजीवी महाकल्प में राजस्थान के पश्चिमी भाग में समुद्र का प्रसार माना गया है। इस समय जैसलमेर व बाड़मेर जिलों के शैल समूह का अवसादन हुआ।
मध्यजीवी महाकल्प के 2 युगों के अवशेष राजस्थान में मिलते हैं-
1. क्रिटेशियस युग :- आबुर, पारवार व फतेहगढ़ श्रेणी के बालूका स्तूप, फास्फेटिक बालूकाश्म, चूना पत्थर व क्ले ।
2. जुरासिक युग :- बेडेसर, बैशाखी, जैसलमेर व लाठी श्रेणी के लिग्नाइट, जीवाश्म युक्त चूना पत्थर इत्यादि मिलते हैं।
जैसलमेर के नेशनल फॉसिल पार्क में पाए गए जीवाश्म, लकड़ी के अवशेष इसी युग के हैं। ये जूरासिक काल के अवशेष है।
4. नवजीवी महाकल्प
इस महाकल्प को तृतीयक व चतुर्थक 2 कल्पों में बाँटा गया है-
1. तृतीयक कल्प :- तृतीय कल्प के शैल मुख्यतः नागौर, डीडवाना-कुचामन बीकानेर, जैसलमेर, फलौदी एवं बाड़मेर, बालोतरा जिलों में पाये जाते हैं। ये शैल जीवाश्म युक्त चूना पत्थर, मुल्तानी मिट्टी व लिग्नाइट आदि के रूप में विद्यमान हैं।
2. चतुर्थक कल्प :- इस कल्प में विकसित शैल समूह भू-भागों पर नदियों, नालों, हवा द्वारा जलोढ़क व बालू रेत का निर्माण करते हैं। इस कल्प के शैल समूह शैलों के निच्छेदन अवधि की जलवायु को भी दर्शाते हैं। इसके फलस्वरुप विभिन्न शैल समूहों का निर्माण हुआ-
(a) भीलवाडा सुपर समूह :- इसमें बुन्देलखण्ड नीस, पट्टित नीस का सम्मिश्रण सम्मिलित है। इसमें ग्रेनाइट की प्रधानता है। इसका विस्तार उदयपुर, चित्तौडगढ, सलूम्बर जिलों के अतिरिक्त दक्षिणी राजस्थान में है।
(b) अरावली सिस्टम :- इसके अंतर्गत क्वार्टजाइट, ग्रिट्स, फाइलाइट्स, लाइम स्टोन, मिश्रित नाइस सम्मिलित है। इसका विस्तार अलवर, अजमेर, उदयपुर तथा सवाई माधोपुर में है।
(c) देहली सुपर समूह :- इसके अंतर्गत रायलो समूह, अलवर समूह, और अजबगढ समूह में प्रधानता केल्साइट, क्वार्टजाइट, ग्रिट और शिष्ट की है।
(d) विन्ध्य श्रेणी :- इसके अंतर्गत पत्थर, शैल की प्रधानता है। पूर्वी राजस्थान तथा दक्षिणी-पूर्वी मेवाड में इसका विस्तार मिलता है।
(e) मालानी श्रेणी :- इसकी चट्टानें रायोलाइटिक लावा समूह से बनी हैं, जो अरावली शिष्ट पर टिकी हुई है। जालौर ग्रेनाइट, सिवाना और एरिनपुरा ग्रेनाइट इसी से संबंधित हैं।
राजस्थान का उच्चावच / धरातल
| भौगोलिक प्रदेश | निर्माण काल |
|---|---|
| 1. अरावली पर्वतीय प्रदेश | आद्यमहाकल्प के प्री-कैम्ब्रियन काल में |
| 2. दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश | क्रिटेशियस काल में ज्वालामुखी उदगार से |
| 3. पूर्वी मैदानी प्रदेश | चतुर्थक महाकल्प में प्लेस्टोसिन काल में |
| 4. पश्चिमी मरूस्थलीय प्रदेश | चतुर्थक महाकल्प के प्लेस्टोसिन कल्प में |
अल्फ्रेड वैगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त के अनुसार सम्पूर्ण विश्व एक पिण्ड के समान था जिसे पैंजिया कहा जाता था, जो चारों ओर से पेंथालासा महासागर से घिरा हुआ था। कालान्तर में पेंजिया के टूटने पर 2 भाग बने जिसमें उत्तरी भाग अंगारालैण्ड व दक्षिणी भाग गोडवाना लैण्ड बना तथा दोनों के बीच टेथिस महासागर का निर्माण हुआ । राजस्थान में गौडवाना लैण्ड व टेथिस सागर के अवशेष मिलते हैं।
राजस्थान में गौडवाना लैण्ड के भाग
1. अरावली पर्वतीय प्रदेश
2. दक्षिणी पूर्वी पठारी प्रदेश
राजस्थान में टेथिस सागर के अवशेष
1. पूर्वी मैदानी प्रदेश
2. पश्चिमी मरूस्थलीय प्रदेश
राजस्थान का निर्माण
राजस्थान प्राचीन काल से मानव को प्रश्रय देता रहा है तथा विभिन्न प्राचीन सभ्यताओं जैसे- कालीबंगा, रंगमहल, बागौर, नगरी, आहड़, बैराठ व बालाथल आदि से जुड़ा हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि राजस्थान में 6000 से 10000 वर्ष पूर्व मानव निवास करता था । कालान्तर में जलवायु परिवर्तनों के फलस्वरूप यहाँ का सम्पूर्ण परिदृश्य बदल गया।
राजस्थान नामकरण का इतिहास प्राचीन ग्रंथों, शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों में समाहित है। ऋग्वेद में इस क्षेत्र को 'ब्रह्मवर्त' कहा गया है, जबकि महर्षि वाल्मीकि ने इसे 'मरूकांतर' के रूप में संदर्भित किया। इस भू-भाग का उल्लेख 625 ईस्वी (682 विक्रम संवत) के बसंतगढ़ शिलालेख में 'राजस्थानादित्य' नाम से मिलता है, जो सिरोही जिले के खीमल माता मंदिर से प्राप्त हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार, 'राजस्थान' शब्द का सबसे पहला उल्लेख 'मुहणौत नैणसी री ख्यात' में मिलता है।
ब्रिटिश काल में इस क्षेत्र को राजपूताना के नाम से जाना जाने लगा। जॉर्ज थॉमस ने सबसे पहले इस भू-भाग को राजपूताना कहा, जिसका प्रमाण 1805 ईस्वी में विलियम फ्रेकलिन की पुस्तक “मिलिट्री मेमॉयर्स ऑफ मिस्टर जॉर्ज थॉमस” में मिलता है। वहीं, कर्नल जेम्स टॉड ने इस क्षेत्र को 'रायथान', 'रजवाड़ा' तथा 'राजस्थान' कहा और उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति "द एनाल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान" (1829 ईस्वी) में 'राजस्थान' शब्द का सप्रमाण उपयोग किया।
स्वतंत्र भारत में 26 जनवरी 1950 को 'राजस्थान' को संवैधानिक मान्यता मिली, और इसके वर्तमान स्वरूप (जिले एवं संभाग) का गठन 1 नवम्बर 1956 को हुआ।
| प्राचीन नाम | वर्तमान नाम |
|---|---|
| यौद्धेय | गंगानगर के आसपास का क्षेत्र |
| कुरु | अलवर का समीपवर्ती क्षेत्र |
| शूरसेन/बृजभूमि | भरतपुर, करौली, धौलपुर का क्षेत्र |
| जांगल | जोधपुर-बीकानेर क्षेत्र |
| अहिच्छत्रपुर | नागौर के चारों ओर का प्रदेश |
| गुर्जर प्रदेश (गुर्जरात्रा) | जोधपुर-पाली का क्षेत्र |
| श्रीमाल/भीनमाल | भीनमाल |
| वल्ल प्रदेश / ढुंगल /मांड | जैसलमेर |
| शाकम्भरी | सांभर |
| शिव / मेदपाट / मेवाड़ | उदयपुर-चित्तौड़गढ़ |
| विराट / बैराठ | जयपुर-अलवर |
| चन्द्रावती/ अर्बुद | सिरोही-आबू क्षेत्र |
| शिवि | उदयपुर / चित्तौडगढ |
| ह्वो ह्वो | कोटा-बूँदी |
| जाबालीपुर / स्वर्णगिरी | जालौर |
| पाल्लन | झालावाड़ |
| कांठल | प्रतापगढ़ |
| व्याघ्रघाट | बाँसवाड़ा |
भौगोलिक विशेषताओं के आधार पर क्षेत्रों के नाम
| कांठल | माही नदी का क्षेत्र |
| छप्पन का मैदान | प्रतापगढ एवं बांसवाडा के मध्य 56 गाँव का समूह |
| मेवल और देवालिया | डूंगरपुर बांसवाडा के बीच का भाग |
| उपरमाल का पठार | भैंसरोडगढ से बिजौलिया का पठारी भाग |
| ढूंढाड | जयपुर व टोंक के आस-पास ढूँढ नदी का प्रवाह क्षेत्र |
प्रचलित भाषा के आधार पर क्षेत्रों के नाम
| हाडौती | कोटा, बूंदी, बारां |
| शेखावाटी | झुंझुनूं, पिलानी, सीकर |
| मेवाड | उदयपुर, भीलवाडा, चित्तौडगढ क्षेत्र |
| बागड | डूंगरपुर, बांसवाडा क्षेत्र |
| मारवाड | पश्चिमी राजस्थान |
📌 राजपुताना नाम
राजपुताना शब्द का प्रयोग जॉर्ज थॉमस ने लगभग 1800 ई. में किया।
➤ जॉर्ज थॉमस के संबंध में विलियम फ्रेंकलिन ने पुस्तक लिखी — “मिलिट्री मेमोर्स ऑफ़ मिस्टर जॉर्ज थॉमस”
➤ पुस्तक का प्रकाशन — 1805 ई.
➤ इस पुस्तक में ‘राजपुताना’ शब्द का प्रयोग मिलता है।
📌 राजस्थान नाम
कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थान के लिए ‘रायथान’, ‘रजवाड़ा’ तथा ‘राजस्थान’ जैसे नामों का प्रयोग किया।
➤ पुस्तक — “द एनाल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान” ➤ अंग्रेज़ी में दूसरा नाम — “द सेंट्रल एंड वेस्टर्न राजपूत स्टेट्स ऑफ इंडिया” ➤ प्रकाशन — 1829 ई.
⭐ कर्नल जेम्स टॉड को ‘घोड़े वाले बाबा’ के नाम से भी जाना जाता है।
📌 ‘राजस्थान’ शब्द का प्राचीन उल्लेख
➤ इतिहासकारों के अनुसार ‘राजस्थान’ शब्द का सबसे पहला उल्लेख ‘मुहणौत नैणसी री ख्यात’ में मिलता है।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तब राजस्थान में 19 रियासतें, 3 देशी ठिकाने (लावा, नीमराना, कुशलगढ़) एवं 1 केन्द्रशासित प्रदेश अजमेर-मेरवाड़ा था, राजस्थान का निर्माण 7 चरणों में 1 नवम्बर 1956 को पूरा हुआ।
🇮🇳 राजस्थान का प्रशासनिक एवं संवैधानिक स्वरूप
📅 30 मार्च 1949
➤ राजस्थान के प्रथम प्रशासनिक स्वरूप का गठन हुआ।
राजप्रमुख — मानसिंह द्वितीय प्रधानमंत्री — हीरालाल शास्त्री
📅 26 जनवरी 1950
➤ ‘राजस्थान’ शब्द को संवैधानिक मान्यता मिली।
📌 संविधान के भाग 7 के अनुच्छेद 238 के अंतर्गत राजस्थान का उल्लेख किया गया था।
राजप्रमुख — मानसिंह द्वितीय मुख्यमंत्री — हीरालाल शास्त्री (मनोनीत)
➤ प्रधानमंत्री का पद समाप्त कर दिया गया।
📅 1 नवंबर 1956 — सामान्य श्रेणी का राज्य
➤ राजस्थान को सामान्य श्रेणी के राज्य का दर्जा मिला।
➤ भारतीय संविधान के भाग 6 में राज्यों से संबंधित प्रावधान हैं।
➤ अनुच्छेद 152 से 237 तक राज्यों से संबंधित प्रावधान हैं।
➤ राज्यपाल पद का सृजन किया गया।
राजस्थान एकीकरण
| चरण | नाम | तिथि | सम्मिलित रियासतें | राजधानी | प्रधानमंत्री |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | मत्स्य संघ | 18 मार्च 1948 | अलवर, भरतपुर, करौली, धौलपुर | अलवर | शोभाराम कुमावत |
| 2 | राजस्थान संघ पूर्व राजस्थान | 25 मार्च 1940 | डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, किशनगढ़, बूँदी, टोंक, कोटा, झालावाड़ एवं शाहपुरा ठिकाना | कोटा | गोकुल लाल असावा |
| 3 | संयुक्त राजस्थान | 18 अप्रैल 1948 | पूर्व राजस्थान / राजस्थान संघ + उदयपुर | उदयपुर | माणिक्यलाल वर्मा |
| 4 | वृहत राजस्थान | 30 मार्च 1949 | संयुक्त राजस्थान + जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर | जयपुर | हीरालाल शास्त्री |
| 5 | संयुक्त वृहत राजस्थान | 15 मई 1949 | वृहत राजस्थान + मत्स्य संघ | जयपुर | हीरालाल शास्त्री |
| 6 | राजस्थान | 26 जनवरी 1950 | सिरोही (दिलवाड़ा और आबूरोड़ को छोड़कर) मिलाया गया। | जयपुर | हीरालाल शास्त्री |
| 7 | पुनर्गठित राजस्थान | 1 नवम्बर 1956 | उपर्युक्त सभी + अजमेर, आबूरोड़ व सुनेल टप्पा क्षेत्र | जयपुर | हीरालाल शास्त्री |
राजस्थान के जिले 1949 में राजस्थान गठन के समय राजस्थान में जिलों की संख्या 25, संभागों की संख्या 5 थी जो वर्तमान में बढ़कर 41 जिले व 7 संभाग हो गए हैं -
| जिला संख्या | नाम | किससे अलग | दिनांक | मुख्यमंत्री |
|---|---|---|---|---|
| 26 वां | अजमेर | जयपुर | 1 नवम्बर 1956 | मोहनलाल सुखाड़िया |
| 27 वां | धौलपुर | भरतपुर | 15 अप्रैल 1982 | शिवचरण माथुर |
| 28 वां | बारां | कोटा | 10 अप्रैल 1991 | भैरोसिंह शेखावत |
| 29 वां | दौसा | जयपुर | 10 अप्रैल 1991 | भैरोसिंह शेखावत |
| 30 वां | राजसमन्द | उदयपुर | 10 अप्रैल 1991 | भैरोसिंह शेखावत |
| 31 वां | हनुमानगढ़ | श्रीगंगानगर | 12 जुलाई 1994 | भैरोसिंह शेखावत |
| 32 वां | करौली | सवाई माधोपुर | 19 जुलाई 1997 | भैरोसिंह शेखावत |
| 33 वां | प्रतापगढ़ | चित्तौड़गढ़, उदयपुर व बाँसवाड़ा | 26 जनवरी 2008 | वसुन्धरा राजे |
| 34 वां | बालोतरा | बाड़मेर | 7 अगस्त 2023 | अशोक गहलोत |
| 35 वां | ब्यावर | अजमेर, पाली, राजसमंद, भीलवाड़ा | 7 अगस्त 2023 | अशोक गहलोत |
| 36 वां | डीग | भरतपुर | 7 अगस्त 2023 | अशोक गहलोत |
| 37 वां | डीडवाना-कुचामन | नागौर | 7 अगस्त 2023 | अशोक गहलोत |
| 38 वां | खैरथल-तिजारा | अलवर | 7 अगस्त 2023 | अशोक गहलोत |
| 39 वां | कोटपूतली-बहरोड | जयपुर एवं अलवर | 7 अगस्त 2023 | अशोक गहलोत |
| 40 वां | फलौदी | जोधपुर एवं जैसलमेर | 7 अगस्त 2023 | अशोक गहलोत |
| 41 वां | सलूम्बर | उदयपुर | 7 अगस्त 2023 | अशोक गहलोत |
रामलुभाया समिति का गठन :- 21 मार्च 2022
रामलुभाया समिति की सिफारिश पर गहलोत सरकार द्वारा 19 नवीन जिलों और 3 संभागों का सृजन किया गया । जिसके पश्चात् राजस्थान में जिलों की संख्या 33 से बढ़कर 50 तथा संभागों की संख्या 7 से बढ़कर 10 हो गयी।
रामलुभाया समिति की सिफारिशों की समीक्षा करने के लिए गठित ललित के पंवार समिति गठित की गयी, जिसकी सिफारिश पर 28 दिसम्बर 2024 को 09 जिलों के सृजन को रद्द कर दिया गया।
पूर्ववृत्ति सरकार ने आचार सहिंता से ठीक पहले 3 नये जिले मालपुरा, सुजानगढ़, कुचामन को बनाने की घोषणा की जिनको वर्तमान सरकार ने 20 जून 2024 को निरस्त कर दिया था।
नये जिलों के पुनर्गठन के सम्बध में समिति का गठन
समिति का गठन - 28 जून 2024
अध्यक्ष - ललित के. पंवार
समिति का कार्य - पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कार्यकाल में बनाये गये 17 जिलें व 3 संभाग की समीक्षा हेतू गठन किया गया
इस समिति ने मदन दिलावर के नेतृत्व में गठित मंत्रिमंडलीय उप समिति को अपनी रिपोर्ट सौप दी।
मत्रिमंडलीय उप समिति
अध्यक्ष - मदन दिलावर (डॉ. प्रेमचंद बैरवा के स्थान पर)
अन्य सदस्य -
उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड
PHED मंत्री कन्हैयालाल चौधरी
राजस्व मंत्री हेमंत मीणा
जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत
राजस्थान में संभागीय व्यवस्था
राजस्थान में संभागीय व्यवस्था की शुरूआत - 30 मार्च 1949 को मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री द्वारा की गई।
प्रारम्भ में राजस्थान में 5 संभाग थे। (1 नवम्बर, 1956 को अजमेर जिले को जयपुर संभाग में शामिल किया गया ।)
24 अप्रैल 1962 को राजस्थान में मोहनलाल सुखाड़िया द्वारा संभागीय व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।
26 जनवरी 1987 को हरिदेव जोशी द्वारा संभागीय व्यवस्था पुनः आरम्भ की गई व अजमेर को छठा संभाग बनाया गया।
4 जून 2005 को 7 वां संभाग - भरतपुर (वसुन्धरा राजे द्वारा) बनाया गया।
7 अगस्त 2023 को रामलुभाया समिति द्वारा 3 नए संभाग बांसवाड़ा, पाली, सीकर बनाए गए जिनको ललित के पंवार समिति की सिफारिश पर 28 दिसम्बर 2024 को भजनलाल सरकार द्वारा रद्द कर दिया गया। अतः वर्तमान में राजस्थान में संभागों की कुल संख्या 7 रह गई है।
| क्र.सं. | संभाग | जिले |
|---|---|---|
| 1 | कोटा (4 जिले) | कोटा, बूँदी, बांरा, झालावाड़ |
| 2 | बीकानेर (4जिले) | बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, चुरू |
| 3 | उदयपुर (7 जिले) | उदयपुर, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा, राजसमंद, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, सलूम्बर |
| 4 | जोधपुर (8 जिले) | जोधपुर, पाली, जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर, सिरोही, बालोतरा, फलौदी (सर्वाधिक जिलों वाला संभाग) |
| 5 | भरतपुर (5 जिले) | भरतपुर, डीग, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर |
| 6 | अजमेर (6 जिले) | अजमेर, नागौर, टोंक, भीलवाड़ा, डीडवाना-कुचामन, ब्यावर |
| 7 | जयपुर (7 जिले) | जयपुर, दौसा, अलवर, सीकर, झुंझुनूं, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड |
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Mukesh Choudhary
Mukesh Choudhary को राजस्थान में आयोजित होने वाली विभिन्न प्रतियोगी एवं भर्ती परीक्षाओं के परीक्षा पैटर्न और प्रश्नों के स्वरूप की अच्छी समझ है। उनके मार्गदर्शन में यह अध्ययन सामग्री और MCQ content तैयार एवं review किया गया है। Read More...